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गुमशुदा फ़िर वो …

                
                                                         
                            गुमशुदा फिर वो मेरी, ज़िंदगी में एक बार आए,
                                                                 
                            
मिलने मुझसे ए काश, अबकी कोई बहार आए।

साथ रोने को कोई , अपना हमें मिला ही नहीं,
हम पे हँसने को यहाँ, लोग तो हज़ार आए।

ज़ख़्म जो दिल पे लगे, वो छुपा लिए सबसे,
महफ़िलों में सदा, हम बन के ग़मगुसार आए।

ढूँढती हैं ये निगाहें, मुंतज़िर सी, उसे हरदम,
क्या पता, किस मोड़ पे, वो दिल-फ़िगार आए।

बहुत ही सख़्त है ज़ालिम, कभी गिला ना किया,
उसका आंसूँ गिरे इस दामन पे, तब क़रार आए।

उम्र भर .. चलते .. रहे , हम धूप के ही साए में,
हुई जब शामे-ज़िंदगी, तब वो साया-दार आए।

दिल की बस्ती तो उजाड़ी थी, उसने ही 'अजय',
आज वो आए भी तो, कैसे फिर इख़्तियार आए।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
52 minutes ago

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