बारिश की बूंदें ये, जख्मों को जगा रही हैं,
जिस्म पर जैसे अंगारे बरसा रही हैं।।
टूटे अरमानों को जैसे दिलासा दे रही हों,
अधूरी यादों को जैसे नया कर रही हों।।
बारिश में ये चाय की चुस्की,
जैसे दर्द के घूँट पिला रही हो,
सीने में फिर हलचल जगा रही हो।।
यादों के ग़म सीने में उतर रहे हों,
सागर की लहरें चाँद से बेताब हो रही हों।।
ये चाय दर्द समझती है,
अब यही संगिनी है।।
अब वजह मिल रही है नए सफ़र की,
ग़मों को सींचकर लिख रहे हैं नई कहानी।।
बूंदों से जख्मों को धो रहे हैं,
सब कुछ भुलाकर अब बढ़ रहे हैं।।
~ अजय प्रताप सिंह "तोमर"
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