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बंदिशें

                
                                                         
                            कभी वो वक़्त भी आता है,
                                                                 
                            
पास होकर भी, दूर–दूर से लगते हो।
होते तो तुम मेरे पास हो,
असल में किसी और के साथ होते हो।

जो सोच रहे हो, वैसा कुछ नहीं
मैं आज भी तुम्हारे पास ही हूँ।
थोड़ा समय बदल गया है,
वरना, मैं हर पल तुम्हारे यादों में ही रहती हूँ।

तभी समंदर की लहरों सी,
मेरे किनारे को छूकर लौट जाती हो।
सफाई का एक मौका भी नहीं देती हो,
उसके पहले ही किनारा कर लेती हो।

तुम नहीं समझोगे मेरे छुपे से जज्बातों को,
कभी खुद को मेरी जगह रखकर देखना।
तुममें, सिर्फ तुम नजर आएगा,
मुझमें कई रूप, बंदिशें नज़र आयेगा।

तुम्हें समझता हूँ,
तभी आज भी उन बंदिशों का सम्मान करता हूँ।
नहीं तो कबका,
सभी सीमाओं को लांघ चुका होता।

ये जिस्म भले तुम्हारे साथ नहीं,
ये मन, सदा तुम्हारे साथ ही रहता है।
भले फिर से अंजान हो गए हैं हम,
ये दिल आज भी तुम्हारे दिल का पता बतलाता है।

-अजय नायक ‘वशिष्ठ’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

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