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इबादत-ए-इश्क़ का ये मर्तबा¹ बना खुदा के लिए,

                
                                                         
                            इबादत-ए-इश्क़ का ये मर्तबा¹ बना खुदा के लिए,
                                                                 
                            
ऐ इब्न-ए-आदम² तू भी पैदा हुआ खुदा के लिए।

ज़माने से ये सिलसिला है क्यों ऐ इब्न-ए-आदम!
तू ख़ुद ही ख़ुद को क़त्ल करता रहा खुदा के लिए।

वो बाम-ए-फ़लक³ से भी हैरत से देखता होगा,
ज़मीं पर आदम⁴ का लहू बहा गया खुदा के लिए।

हज़ार सज्दे किए तूने, मगर ये 'मैं' नहीं टूटी,
अना⁵ का बुत तू ज़हन⁶ से गिरा खुदा के लिए।

उसी का नूर⁷ बसता है हर एक ज़र्रे के सीने में,
तू हर मख़लूक़⁸ को सीने से लगा खुदा के लिए।

तेरे तरकश⁹ में तीर-ए-मोहब्बत भी तो है मौजूद,
ज़माने पर तू इस तीर को भी चला खुदा के लिए।
-अफ़ज़ल खान
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2 महीने पहले

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