हुस्न-ए-लब-ओ-रुख़्सार¹ क्या कीजिए, अब उनका इंतज़ार क्या कीजिए।
रखते हैं उनको चश्म-ए-तर² में मगर, आता नहीं ऐतबार³ क्या कीजिए।
ख़ामोशियों को जब वो पढ़ते नहीं, लफ़्ज़ों से अब इज़हार⁴ क्या कीजिए।
मंज़िल ही जब रूठी हुई हो अगर, तो रास्तों से प्यार क्या कीजिए।
चमन⁵ दिल का 'अफ़ज़ल' उजड़ ही गया, तो अब आरज़ू-ए-बहार⁶ क्या कीजिए ।
- अफ़ज़ल खान
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