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अडिग ज्योति

                
                                                         
                            अंधेरों से डरकर कभी, मैंने रास्ता नहीं बदला,
                                                                 
                            
हवाएं कितनी भी तेज हों, मैंने अपना इरादा नहीं बदला।
मिट्टी के तन में कैद सही, पर रूह मेरी आज़ाद है,
तूफानों की इन रातों में भी, मुझे उजाले की याद है।
जो जलना जानते हैं, वो अंधेरों से नहीं घबराते,
दीपक तो वो हैं, जो स्वयं को जलाकर जग को जगाते हैं।
अगर मेरी लौ एक पल को, कांपकर झुक भी जाए,
तो समझ लेना कि कोई उम्मीद, अभी बाकी रह जाए।
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2 महीने पहले

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