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मछली की गवाही:

                
                                                         
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मत पूछो दरबारों से,
कितना निर्मल पानी है,
जिसकी साँसें घुटती हों,
उसकी आँखों में कहानी है।

तालाबों के राजमहल में
मगरमच्छ मुस्काते हैं,
झूठ की चादर ओढ़-ओढ़कर
सच को रोज़ दबाते हैं।

यदि एक दिन मछली बोले
"यह जल अब विष से भारी है,
हर लहर में छल की गंध है,
हर गहराई लाचारी है।"

तो उस पर विश्वास करना,
वह पानी की बेटी है;
जिसने हर आँधी झेली है,
जिसकी हर साँस सहेजी है।

किनारे बैठे दर्शक तो
बस लहरों का रंग पढ़ेंगे,
भीतर के घावों की पीड़ा
कैसे वे पहचान सकेंगे?

मगरमच्छ यदि कह दे हँसकर
"सब कुछ अच्छा चलता है",
समझो सत्ता का जंगल
फिर कोई सच निगलता है।

सुनो उसी की मौन पुकार,
जो भीतर रहकर रोता है;
इतिहास उसी के आँसुओं से
नया सवेरा बोता है।

सच अक्सर कमज़ोर दिखे,
पर झुकता वह कब होता है?
मछली जब सच कह देती है,
तब पानी भी रोता है।
- डी के कनौजिया
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3 महीने पहले

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