माँ!
तुम्हारे कर-कमलों की ऊष्मा
अब भी
मेरे कपोलों पर ठहरी है।
किन्तु
तुम्हारी छाया
धीरे-धीरे
आकाश की ओर चली गई।
मैंने सोचा
किस रूप में
तुम्हें फिर से धरती पर बुलाऊँ
न दीप पर्याप्त,
न पुष्प पर्याप्त,
न स्वर्णाभूषण,
न स्मारक,
न शब्दों की अलंकृत मालाएँ।
तब
मैंने रोपा
एक नन्हा-सा पौधा
तुम्हारे नाम।
उसकी कोमल पत्तियों में
मैंने देखा
तुम्हारी हथेली का स्पर्श।
उसकी जड़ों में
तुम्हारे त्याग की गहराई।
उसके तने में
तुम्हारे धैर्य का मेरुदण्ड।
उसकी डालियों में
तुम्हारी बाहों का आलिंगन।
जब प्रथम वर्षा आई,
धरती हँसी।
मैं भी हँसा।
लगा
माँ फिर से
आँगन में चली आई है।
जब ग्रीष्म ने
धधकते अंगार बरसाए,
वही पौधा
निःशब्द खड़ा रहा।
जैसे
तुम खड़ी रहती थीं
हम सबकी पीड़ाओं के सम्मुख।
शिशिर आया,
पतझर आया,
आँधियाँ आईं,
किन्तु
उसने हार नहीं मानी।
मैंने जाना,
माँ होना
इसी का नाम है।
वह
अपने लिए नहीं जीता,
अपनी छाया
दूसरों को देता है।
अपने फल
दूसरों को देता है।
अपना प्राणवायु
संसार को देता है।
हर पौधा
माँ की स्मृति है।
हर हरित पत्ती
उसका आशीष।
हर पुष्प
उसकी मुस्कान।
हर फल
उसका वात्सल्य।
हर माँ के नाम
एक वृक्ष।
हर गाँव में
हरित छाया।
हर आँगन में
जीवन का उत्सव।
- डी. के. कनौजिया
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