आराम! तुझे वरदान कहें या अभिशाप कहें,
तू मीठा विष है, कैसे तेरा प्रताप कहें।
तू आया जब जीवन में, श्रम सो गया,
पौरुष का दीप कहीं भीतर खो गया।
हाथों ने औज़ार छोड़े, तकिया थाम लिया,
मन ने संघर्ष छोड़ा, सुख का नाम लिया।
तू कहता-“कल कर लेना, आज क्यों श्रम करना।”
और मनुष्य सीख गया, बस स्वप्नों में ही जीना।
धूप से बचा, तो छाँव ने कमज़ोर कर दिया,
संघर्ष से भागा, तो भाग्य पर दोष धर दिया।
उठ, कर्मभूमि पुकार रही है आज तुझे,
समय चुनौती दे रहा है, ललकार रहा है तुझे।
पथ कठिन है तो क्या, पदचिह्न वहीं बनेंगे,
जो गिरकर उठेंगे, वही इतिहास रचेंगे।
आराम करो, पर रण से विमुख मत होना,
थक जाओ तो रुकना, पर रुककर मत सोना।
जीवन उस दीपक का नाम नहीं, जो बस जलता रहे,
जीवन वह ज्वाला है, जो अँधेरों से लड़ता रहे।
जिस दिन श्रम से प्रेम करेगा यह मानव,
उस दिन भाग्य भी झुकेगा उसके सम्मुख।
आराम नहीं, कर्म ही जीवन का अभिमान है,
उठो, तुम्हारे भीतर अभी अग्नि का गान है।
- डी. के. कनौजिया
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