आँच को भी आग लगा गया वो,
राख में भी शोर जगा गया वो।
जिसे समझा था हमनें ख़ामोश दरिया,
पर्वतों को भी बहा गया वो।
धूप ने जिससे माँगी थी रौशनी,
सूरजों को राह दिखा गया वो।
ज़ख़्म देकर मुस्कुरा भी न सका,
दर्द का अर्थ सिखा गया वो।
नाम तक जिसका न था होंठों पर,
दिल की धड़कनों में समा गया वो।
अब न शिकवा है, न कोई आरज़ू,
जीने का फ़लसफ़ा बता गया वो।
- डी. के. कनौजिया
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