दोस्ती तो बड़े दिल से निभाई थी हमने भी,
फिर ये वफ़ा के बदले बगावत थमती क्यों नहीं?
मोहब्बत की रस्में निभाई तो हमने भी थीं,
फिर ये वफ़ा हमें कभी रास आती क्यों नहीं?
अमन और शांति का दावा जो करते हैं रात-दिन,
वो मुल्क अब आपस में लड़ना छोड़ते क्यों नहीं?
लड़ तो हम भी रहे हैं बरसों से इस जहां में,
फिर ये जीत हमें कभी मुकम्मल होती क्यों नहीं?
इश्क़ के दावेदार तो हम भी हैं ऐ 'आदित्य',
फिर ये इश्क़ की बारिशें हम पर बरसती क्यों नहीं?
-आदित्य
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