मैं हक़ीक़त से बा-ख़बर हूँ, इसलिए तन्हा रहता हूँ,
लोग मतलब से मिलते हैं, मैं ज़रा फ़ासला रखता हूँ।
महफ़िलों की चमक से अब दिल मेरा कतराता है,
अपने भी अपने नहीं होते, मैं ये इल्म रखता हूँ।
अब न शिकवा किसी से, न कोई गिला बाक़ी,
'आदित्य' अपने ज़ख़्मों पर ख़ुद ही मरहम रखता हूँ।
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