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एक छोटा सा प्रश्न

                
                                                         
                            शासक सो रहे है सुकून से जनता की आँखों में है खून
                                                                 
                            
राजा कर रहा है छप्पन भोग जनता को मयस्सर नहीं है चुटकी भर नून
आपको भगवान मानते है हम आपकी बात कभी नहीं टालते है
चाहे सिक्के बदले या बदले जमाना हमने आपका कहा कभी नहीं टाला
कभी कोई गिला शिकवा हुई तो हमने स्वयं मिटा ली
हम बूंद बूंद को तरसे फिर भी आपने हमें दिये फरसे
कभी हमने अपनी तकलीफ की तफसील नहीं करी
हर चीज़ को अपना मुकद्दर समझ कर जिये परंतु आप हमारे लहु पर पट्टी न करवा सके
आपने कर मांगा हमने छोटी से जीवन में से दिया ताकि चिराग़ जलता रहे
पर आपने हमारे चिराग़ का सारा घी है चूस लिया
हमने आपका कब अहित किया कि आपने हमारा कंधा है लिया
जनता के सेवकों को आपने तब भेजा जब मौत के सौदागरों ने अपना जाल को बढ़िया तरह से बिछाया
देश का भावी भविष्य का तो दम है घुट गया
विकसित राष्ट्र निर्माण का स्वप्न है छुट गया
अब कौन मा बाप अपने चिराग को बुझने अपने से दूर भेजेगा
अब कैसे देश का भविष्य बनेगा
अब कैसे देश चलेगा
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एक घंटा पहले

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