मेरी आदतों को समझे कौन
मेरी बातों को समझे कौन
जब मै अपनी बाते रखता हु तो सबको बहुत खलता हु
जब मै होता हु मौन सब पूछे आप कौन
जब मै दु अपना परिचय पता नहीं क्यों अपने ही खींचे मुझे नीचे
समझ नहीं आता कि कौन है अपना और कौन पराया
किस को बोलूं भगवान और किसको बोलूं माया
लोगो ने मेरे ऊपर इतने डाले है जाल आज तक की मै उन्हें नहीं सुलझा सकूंगा जीवन की आखिरी सांझ तक
समझ में नहीं आता मैं क्यों हु यहां पर
मै क्यों नहीं जाता वहाँ पर जहाँ मैं जाना चाहता हूं
माना कि वो रास्ता दुर्गम हैं पर वही पर ही मेरे जीवन का मर्म है
मै कितना समझाऊँ आपने दिल को की यहां कोई नहीं है अपना
सब है एक झुठा सपना एक न एक दिन ये टूटेगा
फिर तू रूठेगा बहुत देर तक
मै समझा न सकूंगा तुझे एक पहर तक
मेरे नाम का अर्थ है सूर्य चमकना मुझे आता नहीं
खुद को चमकाना चाहू तो किसी को मै भाता नहीं
लोगो को सच बताऊ तो वो खार खाते है
झूठ बोलो तो शाबाशी दे जाते है
बचपन में दादी ने बोला था कि झूठ बोलना पाप है
झूठ बोलने से गली में आता सांप है
तो दादी अब बताओ मै क्या करूं
कितना चुप और गुम रहू
कितने गम सहु
क्योंकि आज कदम कदम पर सांप है
प्रत्येक के हृदय में पाप है
अरे मेरा तो कोई है ही नहीं
मै अपने आप से वार्ता कर रहा हूं
क्या ये है सही
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