चाह नहीं मैं अन्य देश का जाकर कभी निवासी बनूँ
चाह नहीं इतिहास-पृष्ठ का केवल एक प्रसंग बनूँ
मेरी तो बस एक अभिलाषा, एक यही अरमान है
सांस-सांस में धड़के जिसके, वह मेरा हिंदुस्तान है।
मुझे बना दो उस माटी का छोटा सा एक ज़र्रा तुम
जिस माटी को माथे रख कर वीर हुए अभिमानी हैं
मुझे सौंप दो उस मशाल की पावन, उज्ज्वल अग्नि-शिखा
जिसको लेकर पुरखों ने लिखी आज़ादी की कहानी है।
मैं न रहूँ शांत बिछौने पर, जब देश पुकारे कर्मों से
मेरी लेखनी से इंक़लाब की अविरल धारा बहती हो
हर सोए हुए मानस में जाग्रत कर दूँ वह जिज्ञासा
कि राष्ट्र-धर्म से बढ़कर कोई और न पूजा होती हो।
तोड़ सभी संकीर्ण दीवारें, नव-निर्माण की राह सजानी है
विज्ञान, कला और पौरुष से, भारत की कीर्ति बढ़ानी है
हे विधाता! देना बस इतनी शक्ति मेरी अभिलाषा को
मेरा पल-पल, मेरा कण-कण, अर्पित माँ की रक्षा को।
— आदित्य देवीलाल यादव
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