विखंडित लहरों का भी सागर अंतिम ठिकाना है,
जब्त बैठी भावनाओं को उफनती नदी को बहाना है।
पथ के शूलों ने भेदा यूँ, कि छलनी चेतना हुई,
उर की रक्षा यूं हुई कि पाषाण संवेदना हुई।।
जिद रही हरदम लड़ लेंगे जैसे भी हो हालात,
युद्ध अपनों से रहा सो लौट आये खाली हाथ।
लक्ष्य आ जाता है अक्सर यूँ हृदय को लुभाने,
नयनों को दिखती अक्सर फिर स्वप्नों की उड़ानें।
नश्वर इस संसार में फैला जब जब अंधकार,
मन ने भी स्वीकार ली जिसने मानी न कभी हार।
उम्मीद की मोतियों ने फिर कहा उठ भी जा ना,
क्योंकि तुझे है अभी रिश्तों का कर्तव्य निभाना।।
-अभिषेक मिश्र
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