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ये कम्बख्त मानता नहीं

                
                                                         
                            पता नहीं कुछ अजीब वास्ता है,
                                                                 
                            
दिल की आग में खामोश मैं आंसू।
कब तक शांत रहूं हाथ पर हाथ रख कर,
अब तक शांत रही हाथ पर हाथ रख।
ये कम्बख्त दिल मानता नहीं,
न करता शिकवा है,
न शिकायत,
बस उनके चाह में डुलता प्यार।

रुक लूं किस औचित्य को लेकर,
ये पतंग खुली आत्मा पर है।
पूछा न ढूंढ बंद पाए,
न आंखें-आंखों से मिल पाएं।
ये कम्बख्त दिल मानता नहीं है,
रुला रही हर याद की चांदनी रातें,
हर वक्त उनके भूलने का मंज़र है।

घड़े की जग मगा - हट उनके गाल पर,
हर नज़र प्यार कहे,
खामोश नहीं चाह हमारे,
बस ये दिल का नाता है।

याद का कुछ न कहूं,
तो क्या कहूं!
हर रात वो चांदनी कहती,
अपने प्यार का भी नया न्याय।
कहता!
ढूंढने की वो खुमारी तो देखो,
देखो उनकी चाल,
हर पल वह कम्बख्त कहां ले,
न क्या कुछ डूबे हुए।

आंखों की शराब से शिकायत,
कहो,
तो वो ,
तो हर बात बाद।
बूंदे अंगारे क्यों!
दिल की उमंग में खामोश है,
ये आंसू,
पता नहीं कुछ अजीब वास्ता है।
-अभिषेक गुप्ता
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47 मिनट पहले

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