उड़ रहा आज कलम मेरा,
लगता है—
कोई देशी चिड़िया आ बसी है मन में।
मेरे कलम और मेरे पास,
पंख नहीं हैं, विचार पुराने हैं,
पर छान रहा है यह अच्छी बातें,
भूल रहा अपनी सब मनमानी।
अंत को ही महाकाल समझ,
मैंने भी कुछ लिखा है,
पतझड़ के आने से पहले,
मैंने कलम और पन्ने को मिलते देखा है।
खिलखिला रहा है कलम अपने किरदार से,
पर मैं थोड़ा बेचैन हूँ,
तुम कुछ और कहो!
हाथ-पैर बाँध दिए मेरे, क्या हुआ?
परंतु तुम वर्तमान की बात न करो,
मैं अच्छा हूँ, भला हूँ, यह मत भूलो।
कलम के मौलिक अधिकार को लेकर,
कूद पड़े हैं विचार,
इसके मन हमसे कितने मिलते हैं!
बाहर के परिवर्तन से नष्ट न करो,
अंदर के विचारों को शब्दों में पिरो डालो तुम।
यह, वह, हर परिभाषा देने को तैयार रहो,
अपनी जीवन-शैली में, अपनी रुचि को पहचानो।
उड़ रहा है कलम विचारों के पंख लगा,
अब अपने मन का मौन व्रत तोड़ो,
अपने जीवन को इस कलम से समझो।
घर की फिक्र अपनी जगह सही है,
पर अपने मन को शांत कर ज़रा सोचो,
उस चिड़िया को याद कर,
कलम से फिर कुछ नया कह दो!
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