तरानों में बहकर हम,
यादों के गलियारों में फिसल गए,
फिर भी क्या अनूठा हौसला था,
हमारी अपनी ही ,
मुलाकातों में।
हल्का सा दर्द उठा ज़रूर,
पर हम फिर बेफ़िक्र हो गए,
न जाने कितनी खामोशियाँ,
हम खुद ही खुद से चुरा ले गए।
क्या बात थी हर उस शख्स की,
जो निगरानी में रहता था,
अब जो कुछ बचा हूँ मैं,
बस यूँ ही बेफ़िक्र सा रहता हूँ।
क्या मैं खुद के ही इस रहस्य को सुलझाऊँ?
तुम ही बताओ, अब मैं क्या करूँ?
क्या शब्दों के इस ताने-बाने में,
खुद को और बुनता जाऊँ?
या अपने ही इस मंज़र को,
कोई सितम मान कर स्वीकार कर लूँ?
चाहता हूँ कि अपनी ही बातों से,
मैं खुद ही खुद में सुलझ जाऊँ... बस सुलझ जाऊँ।
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