यह जो हल्का सा सिकंदर हो उठे हो,
किस नए साक़ी के मंज़र हो उठे हो।
हम भी मौजूद हैं इसी महफ़िल में साया बनकर,
मुड़ के न देखो, कोई ख़ैरियत ही बता दो।
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