आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तब भी रोक नहीं पाता अपने आप को।

                
                                                         
                            मैं,
                                                                 
                            
दौड़ कर थक चुका,
हर महफ़िल से हार चुका हूँ।
उम्र नहीं मेरी ठहर रही,
तब भी रोक नहीं पाता अपने आप को।
हर वक़्त वो मधुर स्वर,
हर वक़्त वो घटाएँ प्यार की,
क्यों हम तंग हो जाते,
हर पहर सोचता हूँ,
हर रात याद करता हूँ,
शायद उन्हें भूल पाऊँगा।
परंतु हर पहर वो,
ऐसा लगता वो साथ हैं हमारे,
हमसे कुछ कह रहे हों।
कदम से कदम मिलाए,
सपनों की रातों में,
हल्का स्नेह-प्रभात उनका मिलता,
मन बेचैनी से कहता,
वो,
उफ़्फ़!
मैं!
— अभिषेक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर