मैं,
दौड़ कर थक चुका,
हर महफ़िल से हार चुका हूँ।
उम्र नहीं मेरी ठहर रही,
तब भी रोक नहीं पाता अपने आप को।
हर वक़्त वो मधुर स्वर,
हर वक़्त वो घटाएँ प्यार की,
क्यों हम तंग हो जाते,
हर पहर सोचता हूँ,
हर रात याद करता हूँ,
शायद उन्हें भूल पाऊँगा।
परंतु हर पहर वो,
ऐसा लगता वो साथ हैं हमारे,
हमसे कुछ कह रहे हों।
कदम से कदम मिलाए,
सपनों की रातों में,
हल्का स्नेह-प्रभात उनका मिलता,
मन बेचैनी से कहता,
वो,
उफ़्फ़!
मैं!
— अभिषेक
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