यह सुषमा रत्न है,
कौन-कौन इससे पागल।
चलता है चलन की दृष्टि,
सुंदर है मन,
मेरे मन का दृश्य॥
तू चाहे पृथ्वी पर आकाश लिखे,
रहना है अपनी धरा पर ही।
कैसे माने मन को नहीं प्यारे,
यह सच्चा सौंदर्य ही है॥
कल्पना कर तू पुष्प है,
पुष्प धरा तो प्रेम धारा है,
करुणा रूपी रोशनी का त्याग नहीं,
यह कुछ तो बड़ी अग्नि है॥
कहाँ से कहाँ जाऊँ देश-विदेश,
पर कण-कण का प्यार हमारे आँगन में,
बने नई धरा का नया नियम,
यह एक रत्न का सौंदर्य है॥
-अभिषेक गुप्ता
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