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क्या कल्पना ही गलत है?

                
                                                         
                            कल्पना की भट्टी में झोंककर,
                                                                 
                            
मैंने खुद को तपाकर नष्ट कर दिया,
क्या आलोचना के इस तीखे प्रहार ने,
मेरे जीवन का ही अंत कर दिया?

जब कभी मन में कोई अभिलाषा जागी,
मैंने अमृत छोड़,
विष का घूंट पी लिया,
क्या खुद की चिंता में डूबा हुआ मनुष्य,
खुद को ही महान बताने लगा है?

मैं किस तरह कृतार्थ करूँ अपने आप को,
जब यह संसार मेरी बात सुनता ही नहीं?
क्या मैं अपने ही विचारों के जाल में फँसकर,
खुद के लिए ही एक बोझ बन चुका हूँ?

तुम ही बताओ...क्या मेरी भावनाएँ,
मेरा सोचना,
मेरी यह कल्पना ही गलत है?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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