बार-बार करुणा की राहों को हमने ही तो मान दिया,
भीतर के इस सीधेपन को खुद ही तो वरदान दिया।
पर बदले में क्या पाया है,
यह मन मेरा हैरान है,
क्या यह करुणा की गरिमा है,
या कोई अज्ञान है?
उनको भी हस्ती का हमने करुणा का एक छंद दिया,
पर विलासिता को जीवन का हमने ही अनुबंध दिया।
क्यों सुख की चाहत में बहकर खुद को ऐसा खोया है?
जो बोया था बीज दया का,
उस पर मन क्यूँ रोया है?
क्या कहूँ मैं इस करुणा की,
आधारहीन इस धारा को?
कैसे समझूँ निश्छल मन की,
इस उलझी विचारधारा को?
क्या यह त्याग समर्पण का है,
या भीतर की दुर्बलता?
मैं समझ न पाया आज तलक,
यह कैसी इसकी उदारता?
बार-बार करुणा की राहों को हमने ही तो मान दिया,
भीतर के इस सीधेपन को खुद ही तो वरदान दिया..
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