शेष रही जो बातें दिल की,
मिलकर उन्हें सुनाना है,
मुझको अपने संग बिठाकर,
सारा भदोही घुमाना है।
पूछा तुमने समय हमारा,
कैसे तुमको समझाऊँ मैं,
इस बंधन में रहकर,
चाहकर भी आ न पाऊँ मैं।
पर स्वीकार किया यह न्योता,
श्रद्धा और सत्कार के साथ,
चलता हूँ मैं यादों में अब,
लेकर तेरा हाथ में हाथ।
स्वाद वहाँ की चाट का अद्भुत,
तुमने जिसका जिक्र किया,
गंगा के सुंदर घाटों का,
मन में मेरे चित्र प्यार।
कहा ,
कि संग में अपने,
मित्रों को भी,
ले आना,
सच्ची मित्रता का,
पावन पाठ हमें ,
हम सिखलाना।
भक्ति और अंजार की जो,
अमर कहानी पावन है,
वैसी ही दोस्ती,
महकाती हर आँगन है।
मीठी बातें,
थोड़ा सा प्यार,
और डाँट का जो अधिकार दिया,
उस डाँट में भी है प्रेम छिपा,
जिसने मुझको स्वीकार किया।
यदि रूठो तुम या डाँटो तुम,
तो याचना कैसी है?
अपनों की डाँट तो अमृत है,
यह प्रीत पुरानी जैसी है।
हम को अपने इस भदोही से,
जो पावन प्यार है,
हर धागे में बुना हुआ,
वहाँ की रंग का संसार है।
कालीन नगरी के वैभव को,
शत-शत नमन हमारा है,
पास सही पर,
मन तो वहीं पधारा है।
मन की झंकृत कर दी,
आया जो पैगाम ,
हृदय हुआ भावुक यह सुनकर,
भरा पैगाम ।
तुमने लिखा कि मिलो एक बार,
कालीन नगरी में आकर,
बैठेंगे हम पास तुम्हारे,
मन के सारे भेद खोलकर।
शेष रही जो बातें दिल की,
मिलकर उन्हें सुनाना है,
मुझको अपने संग बिठाकर,
सारा भदोही घुमाना है।
पूछा तुमने समय हमारा,
कैसे तुमको समझाऊँ मैं,
इस बंधन में रहकर,
चाहकर भी आ न पाऊँ मैं।
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