देखता हूँ जब बादलों को, दिल में एक ख़याल आता है,
ख़ुदा का बनाया यह रंग आख़िर, कैसी अजब चीज़ है!
लाल, पीला, काला—यहाँ हर रंग अपने गुणों से भरा है,
पर मेरे इस दिल को तो बस, यह गेहुआँ रंग ही जमता है।
हमें मध्यम सा, वो प्यारा साँवला रंग चाहिए,
दिल को जो छू जाए, वो गेहुआँ रंग चाहिए।
कभी किसी चादर से ख़ुद को, वो हौले से ढके हुए हो,
शर्मो-हया से अपने मुखड़े पर, वो अपना हाथ रखे हुए हो।
दिखाकर कई अदाएँ जो, इस धड़कन को जीत ले,
हमें उम्र भर के लिए, ऐसा ही एक सुंदर यार चाहिए।
हमें मध्यम सा, वो प्यारा साँवला रंग चाहिए...
सुबह का परदा हटाते ही, जैसी सूरज की लालिमा हो,
कड़कती धूप में भी जिसके चेहरे पर, एक सलोनी चमक हो।
दरवाज़े पर दस्तक देते ही, जो दौड़ी-दौड़ी चली आए,
वो हल्की-फुल्की सी, चंचल सी, गेहुएँ रंग की मूरत हो।
हमें मध्यम सा, वो प्यारा साँवला रंग चाहिए...
घूँघट से ढकी महफ़िल में भी, जो अपनी सादगी से रौनक ला दे,
अपनी पायल के घुँघरू की छन-छन से, पूरे माहौल को नचा दे।
रखकर लाज का परदा जो, हर रिश्ते का मान बढ़ाए,
सूखे हुए मौसम में भी, जो मोहब्बत की बहार ला दे।
हमें खेतों में झूमती हुई, वो गेहूँ की बाली नहीं चाहिए,
हमें तो शिद्दत से बस, इस गेहुएँ रंग से ही प्यार है।
हमें मध्यम सा, वो प्यारा साँवला रंग चाहिए,
हाँ,
हमें तो ज़िंदगी सजाने को, यही गेहुआँ रंग चाहिए।
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