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चार दीवार

                
                                                         
                            बंद पड़े ताले सारे,
                                                                 
                            
कहते कुछ,
गुन-गुनाते भी;
मैं,
मैं सोच में पड़ जाता,
उन्हीं से प्रश्न करता हूँ
"क्या बात है?
"कैसी हलचल,
कहीं ये बिल्ली,
तो चूहे भागे;
परंतु प्रश्न का उत्तर नहीं,
मुझे लगता मैं पागल हूँ।
तो इन्हें,
इनसे मैं सवाल पूछता शाम की आदत से,
परेशान मैं चुप था,
अकेले एक कुर्सी से लिपटे,
जो,
खामोश भले थे,
कई गम और उल्लास समेटे थे,
उत्साह से अभिनंदन करते,
फिर खामोश बढ़ जाते,
उन्हें क्या कहूँ,
पता नहीं मैं,
इनकी खामोशी किससे पूछू,
ये दीवार ऑफ़ है (ऑफ हैं),
किसी ओर,
किसी प्यार में,
ये!
चार दीवार।

- अभिषेक गुप्ता
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एक घंटा पहले

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