क्या मय का सरूर है या कोई नई मदहोशी है,
लब खामोश हैं तेरे, पर हर तरफ़ खामोशी है।
हम भी दीवाने हैं इसी राह के ऐ मुसाफ़िर,
नज़रें न मिलाओ, बस अपनी रज़ा ही बता दो।
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