दो शब्दों का यह सच
क्यों करता है मुझे असहज?
मूक रहने नहीं देता,
प्रतिशोध लेने नहीं देता,
जीवन जीने नहीं देता,
मधुर गीत गाने नहीं देता।
सच का यह दंश
क्यों भीतर उतरकर
मेरी अंतरात्मा पर
देता है एक गहरी खरोंच,
और खा रहा है
मेरे रोम-रोम को नोच?
चौराहों पर खड़ी गाड़ियों के बाहर,
काँच से झाँकती वे कातर आँखें,
कृशकाय शरीर और चेहरों पर बेबसी—
जैसे भूख ने पहन ली हों सलाखें।
भरी हुई हैं इनके जीवन में
केवल राखें ही राखें।
कोई तो इनके जीवन में
कोशिश करके झाँके।
बाहर चेहरों की तो भीड़ है
लेकिन सच आज भी कहीं
एक किनारे अकेला खड़ा है।
दो शब्दों का यह सच
क्यों करता है मुझे असहज?
वृद्धाश्रम के कमरों से झाँकती
बूढ़े माँ-बाप की ज़िंदगियाँ,
और क्रेच में जहाँ गूँजती हैं
बचपन की किलकारियाँ।
जिन हाथों की उँगलियाँ पकड़कर
सीखा था हमने चलना,
और जिनकी गोद में
सीखा था मचलना,
उन्हीं हाथों का दरवाज़े पर
किसी अपने के लौट आने की
राह तकते रहना।
दो शब्दों का यह सच
क्यों करता है मुझे असहज?
न्याय की चौखट पर
एक उम्र बीत जाती है।
उम्मीद की आस में खड़ा आदमी
उम्र की गठरी ढोता रहता है।
तारीख़ पर तारीख़,
और हर तारीख़ के साथ
उसका विश्वास
थोड़ा और मरता है।
गुनाह किया ही नहीं था उसने,
फिर भी सज़ा मुक़र्रर हो गई।
यह कैसी अदालत है, साहब,
यह कैसी अदावत हो गई,
जहाँ बेगुनाही भी
सबूत माँगती है?
जी हाँ,
यही जनता की सियासत है।
दो शब्दों का यह सच
क्यों करता है मुझे असहज?
शिक्षा जहाँ बेची जाती हो,
प्रशस्ति-पत्र जहाँ बाँटे जाते हों,
प्रतिभा का जहाँ उल्लंघन होता हो,
राष्ट्रीय सम्मान पर जहाँ
प्रश्नचिह्न लग जाता हो।
जहाँ जनप्रतिनिधि बिकते हों
और जनता जहाँ ख़रीदी जाती हो,
क्या प्रजातंत्र की यही विशेषता है?
जहां लक्ष्य सिर्फ सत्ता है।
दो शब्दों का यह सच
क्यों करता है मुझे असहज?
धवल वस्त्रों के पीछे
कितने चेहरे स्याह मिले।
मंदिरों-मस्जिदों से लेकर
सत्ता की चौखट तक
लूटने वालों की फ़ौज मिली।
चंद सिक्कों की खनक पर
कितनी अस्मतें बिकती देखीं,
और बिकने वालों से अधिक
ख़रीदने वालों की इज़्ज़त
बचती देखी।
फिर कहते हैं—
समय बदल गया है!
हाँ, समय तो बदला है,
मगर आदमी कहाँ बदला?
चेहरे नए हैं,
चेहरों के पीछे छिपा
वही पुराना सच
आज भी खड़ा है।
दो शब्दों का यह सच
क्यों करता है मुझे असहज?
यह देश है
गांधी, सुभाष और जवाहर लाल का
क्रांतिकारी लाल , बाल और पाल का
राम के आदर्शों की
कृष्ण के जीवन सिद्धांतों की
त्याग और तपस्या की
ज्ञान और बलिदान की
जहां सत्य ही शक्ति थी
और मानवता धर्म
यही था जीवा का मर्म
शायद इसलिए
आँखें मेरी अभी बंद नहीं हुई हैं,
मेरे भीतर का आदमी
अभी पूरी तरह मरा नहीं है।
जिस दिन यह सच
मुझे असहज करना छोड़ देगा,
समझ लेना— उस दिन मेरे भीतर का इंसान मर जाएगा।
-अभय कुमार
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