उतरी है उम्मीद भरी एक किरण मेरे आंगन में,
कहने लगी उठ चल भोर भयी,
दुख की रतिया छठी।
हाथ पकड़कर उठाया उसने मुझे बिस्तर से,
बिल्कुल जैसे, मां उठाती थी बचपन में।
शरीर चाहे कितना टूटे,
पसीना चाहे जितना छूटे।
तू उठ खड़ा हो फिर से, आज के लिए।
एक नयी आवाज लिए।
बेड़ियां चाहे जितनी जकड़ी हो,
विपत्ति चाहे कितनी पकड़ी हों।
अगर - मगर का हाथ मरोड़कर,
तू उठ खड़ा हो फिर से, अपने पैरों पर।
श्वास की आखिरी लड़ी तक,
लहू के आखिरी कतरे तक।
तू जूझ अपने आप से,
तू पूछ अपने आप से।
कि तू क्यों इतना घबराता हैं,
हर गहरी सांझ के बाद,
एक सवेरा आता है।
कि उड़ बिना छोर की पतंग है तू,
उस सवेरे भोर की पहली किरण है तू,
उम्मीद की किरण है तू।।
-अभय राजपूत
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