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ज़िंदगी एक शायरी

                
                                                         
                            ज़िंदगी कभी Y पर आकर रुकती है
                                                                 
                            
या कभी दाहिने मुड़ जाती है और
कुछ पल बाद बायें मुड़ जाती है
पर ज़िंदगी शनैः शनै ढलती जाती है
ज़िंदगी ख़ुद से ऐसे लिपटती है
जैसे हवाएँ गुल से लिपट जातीं है
इसको न रंक समझा न ही राजा
वो मुसलसल एक पहेली बनती जाती है
ज़िंदगी सिर्फ शायरी है अवधी
जो हमेशा लिखी और पढ़ी जाती है
-अभय ‘अवधी’
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47 मिनट पहले

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