आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रिंद मयखाने के

                
                                                         
                            मयकदे की हर साक़ी जाने है मुझे
                                                                 
                            
प्याले की हर मीना पुकारे है मुझे
जमाना पूछे है हमसे हमारी पहचान
मैं हूँ वो रिंद हर मयखाना चाहे है जिसे
प्यासे दिलो को नज़रों से ऐसे पिला साक़ी
कि शेख बन जाए रिंद हर ख़ुम-ख़ाने के
-अभय’अवधी’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर