यार आनी सभी की बारी है
आज मेरी तो कल तुम्हारी है
फ़ैज़ रबका अभी तलक जारी
ये ज़मीं ये फ़ज़ा हमारी है
चार सू ढूंढता फिरे रब को
इक नशा सा सभी पे तारी है
हो गयी दूर जब रियाया तो
जर्ब उस पर लगी करारी है
रोज़ वो ख्वाब मखमली देता
जिसकी जनता खड़ी उघारी है
-हमीद कानपुरी
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