अपनी झोली मे खैरात सजा के निकला हूं
हर ज़ख्म पर मै मरहम लगा के निकला हूं
कैसे नाकाम करेगा मुझको ये जहां
मै घर से मां के पांव दबा के निकला हूं
-अब्दुल बासित
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