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जब से मैंने तुझे दिल में जो बसा रक्खा है

                
                                                         
                            
जबसे मैने तुझे दिल में जो बसा रक्खा है ।
जान को मैरी निशाने पे लगा रक्खा है ।।

जबसे हस्ती तिरी आबाद की है तब ही से ।
अपनी हस्ती को तो बर्बादी पे ला रक्खा है ।।

जबसे वलियों से फ़रिश्तों से सुना है तबसे ।
नाम मैंने तिरा सीने में दबा रक्खा है ।।

तेरी इस हुस्न परस्तिश में मिरे अलमालिक ।
मैंने लकड़ी की तरह ख़ुद को जला रक्खा है।।

मैंंने जब से कलिमा तेेरा पढ़ा है तब से ।
इस ज़माने ने तो तूफ़ान उठा रक्खा है ।।

बद दुआयें ज़मीं से आसमाँ तक जाती हैं l
कुछ "अनीस"ऐसा ही सूफ़ी ने बता रक्खा है ।।


-अनीस बांसवाड़ा 
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3 वर्ष पहले

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