मुझ से भरोसा उठ चुका है मेरे यार का!
कैसे यक़ीं दिलाऊॅं उसे अपने प्यार का!!
वो क़रार बन चुका है दिल-ए-बे-क़रार का!
ख़िज़ा-रसीदा ज़िंदगी में झोंका बहार का!!
कितने जनम गॅंवा दिए उस के इंतिज़ार में!
कुछ तो सिला मिलेगा मुझे इंतिज़ार का!!
हनुमान जो होता सीना चीर कर दिखाता!
समझाना उसे नहीं है मिरे इख़्तियार का!!
अगर नसीब में सब के गुलज़ार ही होता!
फिर होता क्या 'परवेज़' ख़ार-ज़ार का??
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
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