आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

इश्क़ वाला ज़हर

                
                                                         
                            यूँ लहराती ज़ुल्फ़ों से हमारा दिल चुराया न करो,
                                                                 
                            
महकती फ़िज़ाओं में इश्क़ वाला ज़हर मिलाया न करो।

लबों की ख़ामोशी भी क़यामत-सी लगती है तुम्हारी,
यूँ हर बार नज़रों से मोहब्बत जताया न करो।

धड़कनों ने तुम्हारा नाम इबादत-सा लिख रखा है,
यूँ बेवजह दिल को और तड़पाया न करो।

अगर मुकम्मल हो सके, तो उम्र भर साथ निभाना,
वरना ख़्वाब बनकर हर रात आया न करो।

तुम्हारी याद का मौसम बहुत देर ठहर जाता है,
यूँ हर आहट में अपना एहसास जगाया न करो।

इश्क़ अगर सच है तो हाथ थामे रखना आख़िर तक,
यूँ आधे रास्ते में किसी को तन्हा छोड़कर न जाया करो।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर