अगर बीता हुआ कल एक ख़त लिखता,
तो शायद कुछ अधूरे सवाल लिखता,
कुछ लम्हे जो जी न सके हम,
उन लम्हों के अधूरे ख़्वाब लिखता।
लिखता कि वक़्त तो गुज़र गया,
मगर कुछ यादें वहीं ठहरी हैं,
कुछ बातें जो कह न पाए हम,
वो आज भी दिल में गहरी हैं।
कहता कि हर ग़लती बुरी नहीं थी,
कुछ ग़लतियों ने हमें सँवारा है,
जिन रास्तों पर तन्हा चले थे,
वहीं ख़ुद को दोबारा पाया है।
और ख़त के आख़िर में शायद,
बस इतनी-सी बात लिखता—
जो खो गया, उसे भूल जाना,
हर बीता कल लौटकर नहीं आता।
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