बाह्य रूप बनाम अंतर्मन
एक अनोखी अजीब सी बाला,
जिसने बुना था प्रेम का जाला।
उस जाले में मुझे फँसा लिया,
और घर मेरा भी बसा दिया।
वो करती है अट्टहास
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
रूखे-सूखे केश हैं उसके, जैसे सूखी घास,
पास खड़ी हो जाए तो मुझे आए न रास।
पर संस्कारों की खुशबू से, महकी उसकी काया,
उसने ही इस जीवन में, सुख का स्वर्ग सजाया।
वो नेह की मिठास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
आँखें छोटी-छोटी उसकी, रंग है गहरा काला,
देख के चेहरा ऐसा लागे, पीया हो विष का प्याला।
पर दृष्टि में करुणा भरी, ममता की वो खान,
रखती है वो इस घर के, हर जन का सम्मान।
वो रिश्तों की है आस,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
कान बड़े हैं पंखे जैसे, काया है बेढंगी,
देख रूप को दुनिया हँसती,कहती है अतरंगी।
पर धीरज की वो मूरत है, सहती हर अपमान,
घर की मर्यादा को उसने, माना अपना प्राण।
वो धैर्य का वास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
पिचके-पिचके गाल हैं उसके, ठुड्डी बड़ी नुकीली,
देख रूप को लगता जैसे, काया पड़ी है पीली।
मुस्कान में जादू ऐसा है, हर लेती हर पीड़ा,
जैसे गंदे जल में करता, सुंदर नीरज क्रीड़ा।
वो सात्विकता अहसास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
लंबे लंबे दाँत हैं उसके और मसूड़े काले,
देख रूप डर लगता मन में भयपड़ जाए पाले।
मीठी बोली है उसकी, वो कोयल है आँगन की,
घात-पाप कुछ भी नहीं, वो मूरत कंचन की।
वो घर में करे सुवास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
होंठ फटे हैं रूखे से और मुद्रा बड़ी कठोर,
देख उसे सब भाग खड़े हों, मचे गली में शोर।
पर भीतर से कोमल है वो, जैसे हो नवनीत,
गाती है वो जीवन के, बड़े मधुर से गीत।
वो है मधुर विन्यास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
फटे ढोल सी बोली उसकी, एक अजीब सा शोर,
देख उसे सब कान बंद कर, भागे घर की ओर।
पर जब वो लोरी गाती है, सो जाता संसार,
नि:स्वार्थ भाव से करती है वो सबका उपकार।
वो ममता का मधुमास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
गर्दन उसकी लंबी टेढ़ी, जैसे सूखी डाली,
देख उसे सब कहें कि कोई आफत आई काली।
पर बोझ उठाती सारे घर का, थकती कभी नहीं वो,
मुश्किल कितनी भी आ जाए, झुकती कभी नहीं वो।
वो अडिग सा विश्वास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
नसें हाथपर उभरी-उभरी,काया बड़ी ही रूखी,
देख उसे जग कहता है ये, रूप-रंग की भूखी।
पर दान-पुण्य में हाथ खुला है, दिल की है वो रानी,
औरों के दु:ख देख के उसकी, आँखों में आए पानी।
वो करुणा की है प्यास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
उँगली छोटी-बड़ी हैं उसकी हाथ बड़े हैं भारी,
सुंदरता की दौड़ में पूरी दुनिया से है हारी।
पर मेहनत से थकती नहीं, करती काम अपार,
उसके दम पर चल रहा है, मेरा ये संसार।
वो शक्ति का इतिहास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
त्वचा बड़ी खुरदरी है, जैसे कोई पत्थर,
देख उसे मन घबराए, काँपे मेरा अंतर।
पर ममता की वो चादर है, देती सबको ओट,
लगा न पाए उसके मन पे, कोई कभी भी खोट।
वो त्याग का विलास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
हड्डियों का ढाँचा है वो, मांस नहीं है तन पर,
देख रूप डर लग जाए,आ जाए चिंता मन पर।
पर ईश्वर की मूरत है वो, सच्चा उसका साथ,
थक कर जब मैं गिरूँ कहीं तो, थामे मेरा हाथ।
वो अंत समय की आस,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
टेढ़े-मेढ़े पैर हैं उसके ओर गति मतवाली,
देख जिसे ऐसा लागे कि आ गई हो काली।
पर चरणों में स्वर्ग बसा है, वो लक्ष्मी है घर की,
चिंता दूर करे पल भर में, मेरे हर एक डर की।
वो अटूट है विश्वास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
कद छोटा है नाटा उसका, वेश बड़े पुराने,
देख उसे सब कहते हैं, ये आई कहाँ से जाने?
पर बुद्धि की वो तेज बड़ी, चतुर सुजान है नारी,
मुश्किल वक्त में बन जाती है संकट हरने वाली।
वो लक्ष्य का प्रयास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
हँसती है तो बिजली कौंधे, बच्चे डर जाएं नाना,
देख उसे कोई न चाहे, उसके पास है आना।
पर हँसती है जब वो दिल से, मिट जाते क्लेश,
खुशियों से भर देती है वो, मेरा घर और देश।
वो खुशियों का उल्लास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास
चेहरा उसका झुलसा-झुलसा, रंगत बड़ी ही फीकी,
देख दंपती सब कहते, यह बात नहीं है नीकी।
पर मीठे पकवान बनाती है रस की है वो धारा,
उसके हाथों ने ही मेरे घर में स्वर्ग उतारा।
वो तृप्ति का है अहसास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
हाथ-पैर हैं दुबले उसके, जैसे सूखी टहनी,
देख रूप को दुनिया कहती,ये साथ क्या रहनी।
पर सलीका ऐसा है उसका, घर को स्वर्ग बनाया,
सूखे हुए उपवन में उसने, फिर से सावन लाया।
वो खुशियों का निवास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
बदन पे उसके दाग-धब्बे, चमड़ी झुर्रीदार,
कोई न चाहे करना उससे, थोड़ा सा भी प्यार।
पर अंतर्मन हीरा उसका, महके जैसे चन्दन,
उसके ही चरणों में मेरा,वन्दन व अभिनन्दन।
वो शुचिता का प्रकाश,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
बाहर से कैसी भी हो, वो भीतर से है हीरा,
उसने ही तो हर ली है, मेरे मन की सारी पीड़ा।
रूप गौण है गुणों के आगे, कहती दुनिया सारी,
उस गुणवती के आगे तो सारी सुंदरता हारी।
मैं उसका हूँ अब दास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
रूप रंग सब ढल जाता है, गुण रहते हैं पास,
उसके बिना है सूना ये, मेरा सारा वास।
कहे प्रवेश ये सत्य वचन, मूरत है वो मन की,
वही है असली दौलत मेरी आत्मा और तन की
वो एक अमर विश्वास,
तुम आज करो आभास,
मैं खुश हूँ या उदास तुम आज करो आभास।
- प्रवेश कुमार धानका
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