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फिर से कौमी एकता का इतिहास गढ़ता हूंं।

                
                                                         
                            कभी तू मेरी होली का पुआ खा लेना ।
                                                                 
                            
कभी मैं तेरी ईद की सेवईयाँ खा लूंगा।

कभी तू मेरे रामनवी में जयकारे लगा लेना ।
कभी मैं तेरी मुहर्रम में तजिया उठा लूंगा।

कभी तू मुझे गले लगा लेना।
कभी मैं तुम्हें गले लगा लूंगा।

छोड़ो अपने -अपने मजहब की बातें
आओ मिलकर एक मजहब बनाते हैं।

सौहार्द से वशीभूत आपसी भाईचारे से
सजा एक नवभारत बनाते हैं।

जहां न हो कोई भगवा और न हरा रंगा
बस सभी के हाथो में हो एक ही तिरंगा ।

बन तु अश्फाक मैं बिस्मिल्ला बनता हूं।
फिर से कौमी एकता का इतिहास गढ़ता हूं।

-आदित्य रहब़र
गंगापुर, मुजफ्फरपुर, बिहार


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7 वर्ष पहले

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