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सुदर्शन फाकिर

मैं इनका मुरीद

इश्क सुदर्शन फाकिर के साथ हर पल गहरा होता जाता है... 

शरद मिश्र- काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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शायरी और गजलों की  दुनिया में सुदर्शन फाकिर एक जिंदादिल नाम है। एक ऐसा नाम जो हमेशा इश्क के इर्द-गिर्द मंडराता रहेगा। फाकिर इश्क के एहसास को काफी गहराई देते हैं। उनके शब्द और भाव इंसान को अकेले में ही ऐसा महकता गुलशन देते हैं कि आदमी फिर किसी से रश्क नहीं कर सकता। वह सिर्फ इश्क करेगा। या यूं कहें कि  वह इश्क का नायाब बंदा बनकर रह जाएगा। फाकिर लिखते हैं...

'हर इक मोड़ पर हम ग़मों को सज़ा दें 
चलो ज़िंदगी को मोहब्बत बना दें'

 
उनकी कलम कहती है- 

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उन के लिए ज़िंदगानी लुटा दें 
अगर ख़ुद को भूले तो कुछ भी न भूले 
कि चाहत में उन की ख़ुदा को भुला दें'


बहुत ही सरल शब्दों में इतनी गहराई पैदा करना एक बड़े शायर की निशानी होती है। फाकिर का दर्जा काफी बड़ा था। फाकिर मुस्लिम नहीं थे लेकिन उर्दू में जो नज्में उन्होंने लिखी हैं वह गजल प्रेमियों को दीवाना बनाकर रख दी हैं। मैं इसलिए ही फाकिर का मुरीद हूं। इश्क को समझने का उनका अंदाज सबसे निराला है। अनोखा है। यहीं मुझे उनका मुरीद बनाता है। फाकिर ने जिंदगी, प्रेम और इश्क के हादसों को नया मोड़ दिया है। इस मोड़ में आकर आदमी तन्हा होते हुए एक गहरी समझ का इंसान हो जाता है। फाकिर लिखते हैं।
 
'मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है 
क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा 
हमसे पूछो दोस्ती का सिला 
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा 
इश्क़ का ज़हर पी लिया 'फ़ाकिर' 
अब मसीहा भी क्या दवा देगा'


फाकिर की गजलों को पढ़ने के बाद हर कोई अंदाजा लगा सकता है कि फाकिर को मोहब्बत की चोट लगी होगी। यह सच भी है। इश्क के अंजाम से बेखबर नाकामियों को भूल फाकिर शायरी और शराब के साथ जीवन को आगे बढ़ाते हैं। फकीरों सा जीवन जीते हैं। जालंधर आकर वह दीन दुनिया से बेखबर हो जाते हैं। एक बड़े कमरे में इश्क के साथ जीने वाले फाकिर की गजलों ने जगजीत सिंह को नया आयाम दिया। फाकिर एकांत में जीते रहते थे। 'दीवाने गालिब' में रखे अपनी प्रेमिका के विवाह के निमंत्रण पत्र को वह एक नजरों से देखते रहते थे। उन्होंने लिखा भी है- 

'तेरी आंखों  में हमने क्या देखा 
कभी कातिल तो कभी खुदा देखा
'  

सुदर्शन फाक़िर पूर्वी पंजाब के फिरोजपुर में 1934 में पैदा हुए। जालंधर के डीएवी कॉलेज से बीए करने के बाद राजनीति शास्त्र तथा अंग्रेजी में एमए किया। उन्हें कॉलेज के दिनों से ही ड्रामा और कविता का शौक़ था। अपनी युवावस्था में ही उन्होंने मोहन राकेश के नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का निर्देशन और मंचन किया। जालंधर में कुछ दिनों तक उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। लेकिन ये उनका मकाम नहीं था। अभी पूरी दुनिया को उनकी शायरी से रू-ब-रू होना था। वे मुंबई चले गए और दिग्गज संगीतकारों के साथ कई एलबम निकाले।

 अस्सी के दशक में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह के लगभग हर एलबम में सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी ग़ज़लें होती थीं। 

'ज़िंदगी ज़िंदगी मेरे घर आना, आना ज़िंदगी', ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी जैसी नज्में उन्होंने दी। फ़ाकिर का 73 साल की उम्र में जालंधर में 19 फरवरी 2008 को निधन हुआ। 

सुदर्शन फ़ाकिर की लिखी इन लाइनों से इश्क और उसके अंजाम को सीधे-सीधे समझा जा सकता है। लाइनें बताती हैं कि फाकिर एक जिंदादिल शायर के साथ जीवन की गहराई को समझने वाले एक गहरे तत्वचिंतक थे।   

'आदमी आदमी को क्या देगा 
जो भी देगा वही ख़ुदा देगा
मेरा कातिल ही मेरा मुनिसफ़ है
क्या मेरे हक में फ़ैसला देगा
ज़िंदगी को करीब से देखो
इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा
हमसे पूछो ना दोस्ती का सिला
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा'


 
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