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दिलों का अज़ीज़, लहजे से लज़ीज़ और वक्त का ज़दीद शायर

दिलों का अज़ीज़, लहजे से लज़ीज़ और वक्त का ज़दीद शायर।
                
                                                         
                            [यह लेख नई दिल्ली से अभिनव 'अभिन्न' ने लिखा है]
                                                                 
                            

सभी की ज़िन्दगी में प्रीत की ये रीत होती है
ज़रा-सी हार होती है, ज़रा-सी जीत होती है
किसी का गीत होता है किसी की ज़िन्दगानी पर
किसी की ज़िन्दगानी ही किसी का गीत होती है
(हमें तुम गुनगुनाओगे : गीत संग्रह)


ये पंक्तियां हैं हिंदी के युवा और मशहूर शायर और कवि डाॅ. राहुल अवस्थी की। न केवल  राहुल जी के गीतों में ही, वरन् उनकी अन्य रचनाओं में भी आपको हिंदी छंदशास्त्र के विविध विधान मिलेंगे। साहित्य के सर्वमान्य ग्यारह के ग्यारहों रस में उनकी रचनाएं हैं। राममंदिर आंदोलन से फूटी उनकी पद्य रचना हो, जो अपने समय का आईना आगत को दिखा रही हो या फिर संविधान की आत्मा के माध्यम से भारत के जनमानस से संवाद करती उनकी बीसों पृष्ठ की लंबी रचना, सारी रचनाएँ अनूठी हैं। कोई भी कविता क्यों न हो, ज़रा से में ही राहुलजी हर विषय को छू निकलते हैं।

वह संयोग को जिस शुद्धता और शुचिता से लिखते हैं, वियोग को भी उतने ही तन्मयता और अनन्य अधिकार से गाते हैं। इसी तरह वह वीर रस को जिस दीप्ति से कहते हैं, करुण रस को भी उतनी ही तरल सरलता से परिभाषित कर देते हैं। यही स्थिति उनकी भाषा की भी है - हिंदी, ऊर्दू, फ़ारसी, अरबी, अंग्रेज़ी - सब के शब्द उनकी रचनाओं में बड़ी सरलता से टहलते मिल जायेंगे। ब्रज और अवधी ही नहीं, हिंदी की लगभग सभी भाषाओं, यहां तक कि मराठी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के अनेक शब्दों को वह बड़ी सफ़ाई से अपने साहित्य का अभिन्न और विशिष्ट हिस्सा बना लेते हैं।

मैं कहता भी हूं कि यदि आप काव्य में शब्दों की रेंज देखने के भूखे हैं, तो राहुल अवस्थी को पढ़िए, भाषा का इससे अच्छा शेफ़ आपको समकालीन साहित्य में मिल ही नहीं सकता। राहुल अवस्थी यह जानते हैं कि सामने वाले को क्या पसंद है, कितना पसंद है, कैसा पसंद है; इसलिये वे वही और उतना ही परोसते हैं कि आप उंगलियां चाटें, लेकिन अपच के शिकार न हों। बस, इसमें उनकी अपनी निष्ठा, रुचि और अनुभव अवश्य शामिल रहता है। उनकी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द जिस तरह आते हैं, उनके प्रवाह से आप अंदाज़ा ही नहीं लगा सकते कि वह कब आ गए। उदाहरण देखें -

जहां अपनी सदाओं का ज़ख़ीरा छोड़ आये हैं
निगाहों में मुहब्बत का ममीरा छोड़ आये हैं
तुला पर सब्र की, आत्मा अधीरा छोड़ आये हैं
ज़मीं की कोख में अनमोल हीरा छोड़ आए हैं
नज़र की हुक़्मरानी का नगर होगा, पता क्या था
वही अपनी दीवानी का शहर होगा, पता क्या था

(हमारे सामने आओ : गीत संग्रह)
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3 वर्ष पहले

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