भाषा विज्ञानियों का कहना है कि किसी भी भाषा की उन्नति उसके अधिक से अधिक प्रसार में है। कोई भाषा जितने अधिक लोगों द्वारा बोली जाएगी, उतनी ही मजबूत होगी।
टेक्नोलाॅजी का जमाना है इसलिए यह बात भी महत्वपूर्ण है कि- अमुक भाषा तकनीक से किस हद तक जुड़ी हुई है, और उसमें रोजगार के अवसर कितने हैं।
चूंकि हम एक ऐसे समय में 'हिंदी' की बात कर रहे हैं जब अंग्रेजी विश्वभाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है लेकिन सत्य यह भी है कि इसी समय में निज भाषा आंदोलनों ने भी सिर उठाया और तकनीक ने उस स्वर को और मुखर किया। दुनियाभर में लोगों का अपनी भाषा के प्रति रुझान बढ़ा।
'हिंदी' के बारे में जब हम सोचते हैं तो कुछ छवियां मन मस्तिष्क में उभरती हैं, उनमें डाॅ. कुमार विश्वास का नाम प्रमुख है। उन्होंने अपनी कविताओं/शायरी, लाज़वाब संवाद अदायगी और सुरीले कंठ की बदौलत 'हिंदी' को दुनियाभर में प्रतिष्ठित किया।
जब भी मुँह ढंक लेता हूँ
तेरे जुल्फों की छाँव में
कितने गीत उतर आते हैं
मेरे मन के गाँव में
एक गीत पलकों पर लिखना
एक गीत होंठों पर लिखना
यानि सारी गीत हृदय की
मीठी-सी चोटों पर लिखना
जैसे चुभ जाता है कोई काँटा नंगे पांव में
ऐसे गीत उतर आते हैं, मेरे मन के गाँव में
एक ऐसा कवि, जिसने दिल की आवाज को सुनकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी दी, पीसीएस की नौकरी भी छोड़ दी। 'कविता' और 'हिंदी' ने इस तरह अपनी ओर खींचा कि हिन्दी की सेवा में लग गये। जी हां, मोहब्बत के शायर, शब्दों के धनी और अपनी कविताओं से दुनिया का रुख़ हिंदी की तरफ मोड़ देने वाले डाॅ. कुमार विश्वास ने जिस तन्मयता से 'हिंदी' की सेवा की है, वह हिंदी समाज के लिए एक प्रेरणा है।
हिन्दी के इस मुखर कवि ने जब मंच से कहा कि, कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है' तो युवाओं ने इसे हाथों-हाथ लिया और अपना प्रेम गान बना लिया।
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !!
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ, तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !!
दुनियाभर में उनके प्रशंसक हैं...
यह गीत अपनी रचनाकाल से अब तक यात्रा कर रहा है, अनगिनत मंचों से कुमार विश्वास के ख़नकते कंठ ने लोगों को हिंदी के प्रति आकर्षित किया। क्या साक्षर क्या निरक्षर, सबकी ज़बान पर ये गीत एक बार चढ़ा तो आज तक उसकी धमक उसी रूप में बनी हुई है। कुमार विश्वास ने दुनिया को कविता और हिंदी की क्षमताओं का एहसास कराया। हिंदी को एक वैश्विक मंच उपलब्ध करवाया।
लोगों का हिंदी की तरफ झुकाव बढ़ा। दुनियाभर में उनके प्रशंसक हैं। बाजार का युग है इसलिए किसी भाषा के लिए यह जरूरी है कि वह किसी तरह पूंजी से जुड़े और लोग उसमें रोजगार तलाशें। कुमार ने बड़ी तन्मयता से हिंदी के परचम को दुनियाभर में फैलाया।
जो धरती से अम्बर जोड़े...
लेकिन इसके बावजूद हिंदी को जब तुलनात्मक रूप से देखते हैं तो वह हिंदुस्तान में ही अंग्रेजी के सामने कमजोर दिखाई पड़ती है। क्यों कमजोर है? इसके भी कारण हैं। करणों पर चर्चा करते हुए कुमार कहते हैं कि हिंदी का सबसे ज्यादा नुकसान हिंदी के बेटों ने किया है। क्या बात है कि अंग्रेजी में काम करने वाला हिंदीभाषियों से अधिक वेतन पाता है। निज भाषा के प्रति जिस स्वाभिमान की जरूरत होती है, कुमार विश्वास बड़ी मजबूती से उसकी तरफदारी करते हैं।
जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है,
जो शीशे से पत्थर तोड़े, उसका नाम मोहब्बत है,
कतरा कतरा सागर तक तो, जाती है हर उम्र मगर,
बहता दरिया वापस मोड़े, उसका नाम मोहब्बत है
नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर
लोगों की ऐसी समझ बनती है कि कुमार विश्वास ने अपनी प्रेम कविताओं के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाई, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन सत्य यह भी है कि कुमार ने कविता के लिए बहुत सरल और सहज हिंदी का चुनाव किया। उन्होंने अपनी कविताएं आम आदमी की बोली-भाषा में रची। हिंदी को व्याकरणिक हदबंदियों से निकालकर जन-जन तक पहुंचाने, भाषा को सहज और सुगम्य बनाते हुए अपनी सुरीली आवाज दी।
नेह के सन्दर्भ बौने हो गए होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे साथ मेरी भावनायें हैं,
शक्ति के संकल्प बोझिल हो गये होंगे मगर,
फिर भी तुम्हारे चरण मेरी कामनायें हैं,
हर तरफ है भीड़ ध्वनियाँ और चेहरे हैं अनेकों,
तुम अकेले भी नहीं हो, मैं अकेला भी नहीं हूँ
भाषा या ज़बान एक बहते पानी की तरह है
भाषा या ज़बान बहते पानी की तरह है, जहां से भी गुज़रती है वहां की दूसरी चीज़ों को अपने साथ समेटते हुए आगे बढ़ती है। यानि कोई भाषा जब अपनी यात्रा शुरू करती है तब वह अपने साथ उस भाषा के समस्त भूगोल और संस्कृति को समेटे हुए होती है। इसलिए यह कहना जरूरी है कि जब भी वे वैश्विक मंच से हिंदी कविताओं का पाठ कर रहे होते हैं तब सिर्फ 'हिंदी' को ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति को भी दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे होते हैं।
प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए...
कुमार विश्वास ने सिर्फ दुनिया भर में 'हिंदी' का ही परचम ही नहीं लहराया बल्कि 'कवि सम्मेलनों' को भी पंडालों से निकाल कर आईआईटी, आईआईएम जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों तक पहुँचाने का भी काम किया। पिछले दिनों 'गूगल' ने भी हिंदी के इस सुरीले कवि को खोजा। यह 'हिंदी समाज' के लिए गर्व की बात है।
प्यार जब जिस्म की चीखों में दफ़न हो जाए,
ओढ़नी इस तरह उलझे कि कफ़न हो जाए,
घर के एहसास जब बाजार की शर्तो में ढले,
अजनबी लोग जब हमराह बन के साथ चले,
लबों से आसमां तक सबकी दुआ चुक जाए,
भीड़ का शोर जब कानो के पास रुक जाए,
सितम की मारी हुई वक्त की इन आँखों में,
नमी हो लाख मगर फिर भी मुस्कुराएंगे,
अँधेरे वक्त में भी गीत गाये जायेंगे...
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एक गीत पलकों पर लिखना
5 वर्ष पहले
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