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गुलज़ार की नज़्मों में आप उनकी ज़िंदगी का ही दर्द पाएंगे

गुुलज़ार की  नज्में
                
                                                         
                            
कहते हैं कच्ची उम्र में जो हादसे घट जाते हैं उनकी यादें भले धुंधली हो जाएं पर उनका असर ताउम्र बना रहता है। यह असर इतना गहरा होता है कि आपकी सोच और समझ को प्रभावित करता है और आपके निर्णय लेने की क्षमता को भी।

ऐसा ही हादसा गुलज़ार के साथ हुआ। इससे अकेले गुलज़ार ही प्रभावित नहीं हुए, लाखों के लिए यह जिंदगी भर के लिए नासूर बन गया। हादसे का नाम था बंटवारा। गुलज़ार की रचनाओं में यह दर्द साफ़ दिखता है। 

गुलज़ार अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहते ‌थे पर उनके बड़े भाई और पिता ने उन्हें पढ़ाने से इंकार कर दिया। विस्‍थापन के बाद पढ़ाई से भी दूर हो चुके गुलज़ार अपना आकाश तय करने के लिए मुंबई चले आए। मां-पिता से दूर गुलज़ार हमेशा इम्तिहान के दौर से गुजरते रहे। मुंबई आकर उन्‍होंने गैरेज में मेकेनिक का काम किया। दिल्ली में भी उन्होंने अभाव और ग़म की ज़िंदगी काटी। 

विस्‍थापन का दर्द गुलज़ार की इस नज्‍़म में देखने को मिलता है...

आदमी बुलबुला है पानी का 
और पानी की बहती सतह पर 
टूटता भी है डूबता भी है 
फिर उभरता है, फिर से बहता है 
न समुंदर निगल सका इस को 
न तवारीख़ तोड़ पाई है 
वक़्त की हथेली पर बहता 
आदमी बुलबुला है पानी का 


बंटवारे के माहौल को गुलज़ार अपने तरह से बयां करते हैं...

बात उन दिनों से क़रीब 11 बरस पहले की है, जब हिंदुस्तान को चीरकर दो हिस्सों में तक़्सीम नहीं किया गया था। तब चिनाब, झेलम, सिंधु और रावी का पानी बिना किसी बंटवारे के गुनगुनाता आज़ाद बहता था। तब न कोई हिंदू था, न कोई मुसलमान। तब लोग सिर्फ़ हिंदुस्तानी हुआ करते थे। तब 'माचिस' की तीलियां या तो चराग़ जलाने के लिए सुलगती थीं, या फिर चूल्हे। पहाड़ों और आसमान पर भी तब दूरबीनों के पहरे नहीं थे। बर्फीले पहाड़ों से उतरती बर्फ़ में भी तब रिश्ते आज की तरह ठंडे नहीं पड़े थे।

विस्‍थापन से दुखी गुलज़ार की रचनाओं में खोने का एहसास आपको हर जगह मिलेगा। जन्मभूमि से विस्‍थापित होने के दौरान बंटवारे के बाद परिवारों की बदहाली और तड़प उनके मन में एक गहरे ख़ालीपन को पनपा दिया। गुलज़ार की रचनाओं में यह ख़ालीपन आपको उस समय के दर्द से परिचित कराएगा। गुलज़ार के पिताजी की दिल्ली में मृत्यु हुई पर उस समय वह मुंबई में काम कर रहे थे।

उनके परिवार ने पिता की मृत्यु की सूचना उनको नहीं दी। उनके बड़े भाई मुंबई में रहते ‌थे, खबर पाते ही हवाई जहाज़ से दिल्ली पहुंच गए। गुलज़ार को पिता की मौत की ख़बर दिल्ली के किसी करीबी से कई रोज़ बाद मिली। ख़बर पाते ही वह दिल्ली की ओर चल पड़े। 24 घंटे की यात्रा के बाद जब वह दिल्ली में अपने घर पहुंचे तब तक सब कुछ ख़त्म हो चुका था। गुलज़ार दिल में एक सूनापन लेकर मुंबई लौट आए। वो लिखते हैं कि उन्हें पिता के दाह संस्कार का मौका भी मिला। सो पिताजी मरकर भी मेरे लिए जी रहे थे। मेरे मन में इस बात का सदमा ‌था कि मैं अपने ‌पिता से लिपट कर रो नहीं सका था। 

घटना दिल में असर छोड़ गई

विभाजन के समय गुलज़ार महज 11 बरस के थे। देश में उस समय जो हालात रहे, उसका उनके मन म‌स्तिष्क में गहरा असर हुआ। सरहद बंटने के बाद एक तरह से उनका बचपन पाकिस्तान में छूट गया और वह उसकी याद में डूबे रहे। लेकिन एकांत में मायूस बचपन उन्हें संवारता रहा। यह उनकी कविताओं में झलकता है। वह कहते हैं, 'विभाजन के जिस दौर से वो गुज़रे हैं, वह एक लंबी दास्तां है'। उन्होंने लाशें देखीं और खून से लथपथ बदहवास लोग देखे, जो अपने जीवन को बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे थे। कहीं किसी का बच्चा गुम हो गया था तो कोई खोया बच्चा अपनी मां को अपलक निगाहों से तलाश रहा था। लोगों के साथ एक लंबी भटकन जुड़ गई। बंटवारें ने कई सवालों को पैदा किया। 

गुलज़ार की कविताओं में विभाजन का दंश कालांतर में हमेशा उभरता रहा। वो इस त्रासदी को याद करते हुए लिखते हैं कि बच्चों की मां अपने गहने पोटली में रख रही थी तो उनके पिता पैसों के साथ कपड़े और बिस्तर संभाल रहे ‌थे। उनकी आंखों में आजादी मिलने की खुशियां जरूर थी लेकिन लाखों लोगों का आशियां उजड़ने का ग़म भी था। गुलज़ार कहते हैं कि भारत-पाक अब भले एक नहीं हो सकते लेकिन एक दूसरे की सलामती की दुआ तो अवश्य कर सकते हैं। वह कहते हैं, बंटवारे का सबसे अधिक फायदा राजनेताओं को मिला लेकिन दोनों देशों के लोगों को प्रेम और भाईचारे की उम्मीद  हमेशा अपने मन में  कायम रखना चाहिए। गुलज़ार के ये बोल शायद उनके अंदर कहीं कोने में छिपा हुआ विस्‍थापन का दर्द तो नहीं?

एक बार कहीं उन्होंने कहा भी था कि 'विभाजन मेरी लेखनी का बहुत अहम हिस्सा है, क्योंकि बहुत शुरुआती ज़िंदगी में वो दौर देखा और उसका असर आज तक है। आज भी कहीं सांप्रदायिक दंगे देखता हूं, तो मुझे विभाजन की ही याद आती है और उससे तक्लीफ़ होती है।'

एक और गज़ल

चार तिनके उठा के जंगल से 
एक बाली अनाज की ले कर 
चंद क़तरे बिलकते अश्कों के 
चंद फ़ाक़े बुझे हुए लब पर 
मुट्ठी भर अपनी क़ब्र की मिट्टी 
मुट्ठी भर आरज़ुओं का गारा 
एक तामीर की, लिए हसरत 
तेरा ख़ाना-ब-दोश बे-चारा 
शहर में दर-ब-दर भटकता है 
तेरा कांधा मिले तो सर टेकूं 

(किताब यार जुलाहे का एक संपादित अंश)
9 वर्ष पहले

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