बांग्ला साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर रवीन्द्रनाथ ठाकुर बीसवीं शताब्दी के शुरुआती चार दशकों तक भारतीय साहित्याकाश में ध्रुवतारे की तरह चमकते रहे। 'गीतांजलि' के लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। पेश है 'गीतांजलि' से 3 चुनिंदा कविताएं-
अनजानों से भी करवाया है परिचय मेरा तुमने
जानें, कितने आवासों में छांव मुझे दिलवाया है
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने
भाई बनवाए हैं मेरे अन्यों को, जानें, कितने
छोड़ पुरातन वास कहीं जब जाता हूं मैं
क्या जानें क्या होगा सोचा करता हूं मैं
नूतन बीच पुरातन हो तुम, भूल इसे मैं जाता हूं
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने
जीवन और मरण में होगा अखिल भुवन में जब वो भी
जन्म-जन्म का परिचित चिन्होगे उन सबको तुम भी
तुम्हें जानने पर न पराया होगा कोई भी
नहीं वर्जना होगी और न भय ही कोई भी
जगते हो तुम मिला सभी को, ताकि दिखो सबमें ही
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने
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बैठा हूं मैं, ताकि प्रेम के हाथों पकड़ा जाऊं...
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