रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक 'रक्षा बंधन' असल में मानवीय भावों का बंधन है। यह एक ऐसा उत्सव है जिस पर कवियों और शायरों ने भी अपने एहसास बड़ी संजीदगी से व्यक्त किए। पेश है 'रक्षाबंधन' शायरों के चुनिंदा अल्फाज़-
चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी
सुनहरी सब्ज़ रेशम ज़र्द और गुलनार की राखी
-नज़ीर अकबराबादी
किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा
- मुनव्वर राना
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राखियाँ ले के सिलोनों की बरहमन निकलें
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