रामा हो रामा, जियवा, जियरवा, हरी-हरी ना, मयनवा, सुगनवा, झीर-झीर बुनिया जैसे देशज शब्द कजरी लोकगीतों के लालित्य को प्रगट करते हैं। शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय संगीत में मल्हार, देस, ठुमरी की बंदिशों में पिरोयी प्रेम-विरह की भावनाएं बेहद आकिर्षत करती हैं। वर्षा की शुरुआत होते ही कजरी उत्तर भारत में महिलाओं के सुरों से गूंजने लगती है। महिलाएं सावन को जीना चाहती है। सावन के राग मिलन और विरह के ही रंग में रंगे हैं। सावनी फुहारों में आनंद की बारिश होती है। इसलिए भी यह मेरे लिए सबसे प्यारा महीना है...। यह कहना है बनारस घराने की ठुमरा गायिका पद्मजा चक्रवर्ती का।
ठुमरी गायिका पद्मजा सावन का नाम आते ही राग मिया मल्हार राग की बंदिश गुनगुनाने लगती हैं-
बरसन लागे रे बदरिया सावन की रुत कारी कारी
अति डरपावन बरसन लागी रे बादरिया...
चमकि चमकि बिजुरिया चमके प्यारे पवन बहे
अब तो प्यारे चौक पड़े गरजन लागी रे बदरिया...।
वह बताती हैं कि बरखा ऋतु के गीतों में मेघ और प्रियतम की तुलना समान रूप से की गई है। इस मास में विरह, मिलन की विशेषताएं रागों में बहुत संजीदती से कवियों ने व्यक्त की हैं।
राग देस में वह ठुमरी का उदाहरण देती हैं-
रे मां कारी बदरिया बरसे पिया नहिं आए ...
ज्यों ज्यों पपिहा पिउ पिउ बोलत है
सूनी सेज मोरा जियरा तरसे....।
पद्मजा बताती हैं कि पिया को संदेश भेजने के लिए नायिका अनेक जतन करती है। वह कभी काले बादलों से अरज लगाती है तो कभी कागा से। राग तिलक कामोद में ठुमरी की बंदिश के जरिए वह बताती हैं-
अबके सावन घर आ जा पिया मोरे ...
उड़ जा रे कागा ले जा रे संदेसवा...
पिया के पास सोने चोंच मढ़इबो रे...।
ठुमरी गायिका का कहना है कि इस महीने में राधा के बिना श्याम भी विरह में व्याकुल हो जाते हैं। वह पद्मविभूषण गिरिजा देवी की बंदिश सुनाती हैं-
घिरि आई है कारी बदरिया
राधे बिनु लागे मोरा जिया...
छिन जमुना तट छिन कुंजन में...
विरह व्यथा से दहत है मनवा राधे मोरा जिया...
बदरा बरसे नैना बरसे घन औ श्याम से लागी है होड़वा....।
वह पुरानी बंदिश बताती हैं कि नैहर में इस महीने रहने का दुख भी खूब मिलता है-
तरसे ला जियरा हमार
हमार नइहर में
बाबा हठ कइले गवन नाहीं दिहले...।
बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...
बादर गरजे बिजुरी चमके ...
जैसी बंदिशें इसका प्रमाण हैं।
वह श्याम की राधा से मनुहार की एक और बंदिश सुनाती हैं-
कहनवा मानो ओ राधा रानी
निशि अंधियारी कारी बिजुरी चमके रिमझिम बरसत पानी...
हाथ जोरि तोरी विनती करत हूं...
ना माने मोरि बानी ...
तुम ही अनोखे विदेस जवैइया....
हरिश्चंद सैलानी.. कहनवा मानो हो राधा रानी...।
वह झूला की बंदिशों में प्रेम-शृंगार का वर्णन इस तरह करती हैं-
झूला धीरे से झुलाओ बनवारी रे सांवरिया...
झूला झुलत मोरा जियरा डरत है लचके कंदबिया की डारी रे सांवरिया...
अगल-बगल दुई सखिया झुलावे, बिचवां में झूलें राधा प्यारी रे सांवरिया...।
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