एक फ़कीर एक गांव में अक्सर जाया करता था और एक बच्चा उनके पीछे-पीछे घूमा करता था, एक दिन उस फ़कीर ने बच्चे को गोंद में उठा लिया और कहा कि- " जा बच्चा तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा। दुनिया तेरे नाम की दीवानी होगी।'' वही बच्चा आगे चलकर स्वर सम्राट मोहम्मद रफी के नाम से पहचाना गया। कहते हैं रफी साहब को एक फ़कीर की दुआ थी। पेश है रफी साहब के गाये फिल्मी नगमों के चुने हुए शेर-
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम
- साहिर लुधियानवी
- फिल्म- प्यासा (1957)
कल रात ज़िन्दगी से मुलाक़ात हो गयी
लब थराथरा रहे थे मगर बात हो गयी
- शकील बदायुनी
फिल्म-पालकी (1967)
इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा
बहते हुए आँसू रुक न सके, कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा
- क़मर जलालाबादी
फिल्म- प्यार की जीत (1948)
गुज़रे हैं आज इश्क़ में हम उस मक़ाम से
नफ़रत सी हो गई है मुहब्बत के नाम से
- शकील बदायुनी
फिल्म- दिल दिया दर्द लिया (1966)
दिल सुलगने लगा अश्क़ बहने लगे
जाने क्या-क्या हमें लोग कहने लगे
-फारुख़ कैसर
फिल्म- पारसमणि (1963)
आप ने सीखा है क्या दिल के लगाने के सिवा
आप को आता है क्या नाज़ दिखाने के सिवा
- राजा मेंहदी अली खान
फिल्म- नीला आकाश (1965)
दिल का सूना साज़ तराना ढूँढेगा
तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ निशाना ढूँढेगा
- असद भोपाली
फिल्म- एक नारी दो रूप (1973)
कोई सागर दिल को बहलाता नहीं
बेख़ुदी में भी करार आता नहीं
- शकील बदायुनी
फिल्म- दिल दिया दर्द लिया (1966)
तुझे प्यार करते हैं, करते रहेंगे
के दिल बनके दिल में धड़कते रहेंगे
- हसरत मोहानी
फिल्म- अप्रैल फूल (1964)
चले आज तुम जहां से, हुई ज़िंदगी पराई
तुम्हें मिल गया ठिकाना, हमें मौत भी न आई
- शकील बदायुनी
फिल्म- उड़न खटोला (1955)
तुझे भूल जाऊँ ये मुमकिन नहीं है
कहीं भी रहूँ मेरा दिल तो यहीं है
- हसरत मोहानी
-फिल्म- अप्रैल फूल (1964)
सूनी हैं दिल की राहें, खामोश हैं निगाहें
नाकाम हसरतों का उठने को है जनाज़ा
- शकील बदायुनी
फिल्म- उड़न खटोला (1955)
अगर मर गया रूह आया करेगी
तुझे देख कर गीत गाया करेगी
- हसरत मोहानी
फिल्म- अप्रैल फूल (1964)
कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद
ज़िदगी से मिले मौत आने के बाद
- शमीम जयपुरी
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूं
ये मुरादों की हंसी रात किसे पेश करूं
- साहिर लुधियानवी
फिल्म- ग़ज़ल (1964)
मैंने जज़्बात निभाए हैं उसूलों की जगह
अपने अरमान पिरो लाया हूँ फूलों की जगह
- साहिर लुधियानवी
फिल्म- ग़ज़ल (1964)
कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया
बात निकली, तो हर इक बात पे रोना आया
- साहिर लुधियानवी
फिल्म- हमदोनों (1961)
कौन कहता है कि चाहत पे सभी का हक़ है
तू जिसे चाहे, तेरा प्यार उसी का हक़ है
- साहिर लुधियानवी
फिल्म- ग़ज़ल (1964)
ज़िन्दगी आज मेरे नाम से शर्माती है
अपने हालत पे मुझे खुद भी हंसी आती है
- शकील बदायुनी
फिल्म- सन् ऑफ इंडिया (1962)
राह चलते हुए कुछ सोच के रुक जाता हूँ
हर कदम पे कोई भूली हुई याद आती है
- शकील बदायुनी
फिल्म- सन् ऑफ इंडिया (1962)
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