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मज़हब और 20 मशहूर शेर...

majhab
                
                                                         
                            मज़हब पर गुफ़्तुगू एक ऐसी गुफ़्तुगू है जो कभी ख़त्म नहीं होती। आम आदमी उसे अगर ख़त्म करना भी चाहे तो सियासत उसे किसी न किसी रूप में जिंदा रखती है। शायरों ने भी मज़हब अपने नजरिए से देखा है। शेरो-शाइरी की श्रृंखला में पाठकों के लिए पेश है 'मजहब' पर शायरों के अल्फ़ाज-   
                                                                 
                            

हर एक दौर का मज़हब नया ख़ुदा लाया
करें तो हम भी मगर किस ख़ुदा की बात करें
- साहिर लुधियानवी

मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्ती 
दुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है 
- फ़िराक़ गोरखपुरी

नाम पे मज़हब के...

जहालत रोग था जो दिल के अंदर
वही मज़हब हमारा हो गया है
- अहमद शनास

नाम पे मज़हब के जमघट है लोगों का
शहर में शायद दंगा होने वाला है
- परविंदर शोख़

शैख़ अपनी रग को क्या करें रेशे को क्या करें 
मज़हब के झगड़े छोड़ें तो पेशे को क्या करें 
- अकबर इलाहाबादी
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नाम पे मज़हब के...

8 वर्ष पहले

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