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काव्य चर्चा

मज़हब और 20 मशहूर शेर...

अमर उजाला, काव्यडेस्क, नई दिल्ली

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मज़हब पर गुफ़्तुगू एक ऐसी गुफ़्तुगू है जो कभी ख़त्म नहीं होती। आम आदमी उसे अगर ख़त्म करना भी चाहे तो सियासत उसे किसी न किसी रूप में जिंदा रखती है। शायरों ने भी मज़हब अपने नजरिए से देखा है। शेरो-शाइरी की श्रृंखला में पाठकों के लिए पेश है 'मजहब' पर शायरों के अल्फ़ाज-   

हर एक दौर का मज़हब नया ख़ुदा लाया
करें तो हम भी मगर किस ख़ुदा की बात करें
- साहिर लुधियानवी

मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्ती 
दुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है 
- फ़िराक़ गोरखपुरी
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नाम पे मज़हब के...

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